नफरत का दहन (लघु कथा)

नफरत का दहन 

सुनीता व निर्मला दोनों सहपाठी थीं। दोनों कक्षा में एक साथ बैठतीं, एक साथ खाना खातीं, दोनों पक्की सहेलियाँ थीं। अपना हर सुख दुःख एक-दूसरे से साझा करती थीं। एक दिन कुछ अजीब हुआ। उनकी कक्षा की छात्रा संजना ने कुछ ऐसी बात कही कि सुनीता व निर्मला की दोस्ती में दरार आ गई। जो सहेलियाँ कभी एक दूसरे के बिना अधूरी थीं अब एक दूसरे की दुश्मन बन गईं। आमने-सामने आना भी उनको गवारा न था। सुनीता बहुत ही ज्यादा संवेदनशील लड़की थी। वह दोनों के रिश्ते के टूटने की कारण बहुत दु:खी तथा उदास रहने लगी। वह अब आगे से निर्मला से बात करने का प्रयास करती, उस बात को जानने की कोशिश करती जिसकी वजह से उनकी दोस्ती दुश्मनी में बदल गई थी। निर्मला जिद्दी थी। उसने सुनीता की भावनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया दिन गुजरते गए और होली का त्यौहार नजदीक आ गया। संजना को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने निर्मला को सब कुछ सच बता दिया कि सिर्फ उन दोनों की दोस्ती से चिढ़कर ही उसने ऐसा किया था। निर्मला को बहुत पछतावा हुआ कि सिर्फ कानों सुनी बातों पर विश्वास करके उसने विश्वासपात्र दोस्त को खो दिया। होली की शाम थी। सभी होलिका दहन हेतु एकत्र हुए थे। 

निर्मला ने सुनीता को वहां देखा तो वह दौड़कर उसे उसके लिपट गई। इधर होलिका दहन हो चुका था। इस दहन में उनके रिश्ते में जो गलतफहमी से नफरत पैदा हुई थी वह भी धू धू कर जलने लगी।

रचनाकार

सुनिता मीणा 

(उपप्राचार्य)

शेरपुर खिलचीपुर 

सवाई माधोपुर (राज.)

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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