भरोसा - सुषमा दामोदर लाहोटी (पिंकी)

भरोसा

भूमिका

परिवार की वास्तविक शक्ति केवल रक्त-संबंधों में नहीं, बल्कि उन भावनात्मक रिश्तों में निहित होती है, जिन्हें अपनापन, सेवा, संवेदनशीलता और विश्वास से सींचा जाता है। समय के साथ यह सत्य और भी स्पष्ट होता जाता है कि किसी घर की सुख-शांति केवल जिम्मेदारियों के निर्वहन से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की छोटी-से-छोटी आवश्यकताओं और भावनाओं को समझने से बनी रहती है। प्रस्तुत लघुकथा 'भरोसा' इसी जीवन-सत्य को अत्यंत सहज और मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करती है। यह किसी की भूमिका को कम या अधिक आँकने का प्रयास नहीं करती, बल्कि यह रेखांकित करती है कि जो संबंध प्रेम, सम्मान, आत्मीयता और समर्पण से निभाए जाते हैं, वही बुढ़ापे का सबसे सशक्त सहारा बनते हैं। यही संदेश इस कथा को केवल एक पारिवारिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों का संवेदनशील दस्तावेज बना देता।

लघुकथा

"मुझे पूरा भरोसा है कि यदि हम एक प्रतियोगिता रखें, तो हमारे बेटे हार जाएंगे।" — सीता ने मुस्कुराते हुए कहा।

"और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे बेटे ही जीतेंगे।" — अरुणा ने तुरंत प्रत्युत्तर दिया।

तारा, रीना, राखी और गीता ने भी अरुणा की बात का समर्थन किया।

सीता ने सहज भाव से कहा, "तो फिर निर्णय हो गया। अभी शाम है। सभी के बेटे-बहू कार्यालय से लौट चुके होंगे। उन्हें रात ठीक नौ बजे बुला लेते हैं। तब तक हम अपनी किट्टी का आनंद लेते हैं।"

रात के ठीक नौ बजे सभी बेटे और बहुएँ आ पहुँचे। चाय-नाश्ते और सामान्य बातचीत के बाद सीता ने बेटों को एक पंक्ति में तथा बहुओं को दूसरी पंक्ति में खड़ा कर दिया।

उन्होंने कहा, "आप सभी से दो-दो प्रश्न पूछे जाएंगे। बेटा और बहू, दोनों अलग-अलग उत्तर देंगे।"

सभी सहमत हो गए।

सबसे पहले अखिल और उर्मिला की बारी आई।

सीता ने पूछा, "आपके मम्मी-पापा को खाने में सबसे अधिक क्या पसंद है?"

अखिल कुछ क्षण सोचता रहा, फिर बोला, "मम्मी-पापा की कोई विशेष पसंद नहीं है।"

उर्मिला ने बिना देर किए उत्तर दिया, "पिताजी को मीठे में खीर के साथ मूंग की दाल के पकोड़े बहुत पसंद हैं और माताजी को पानी-पूरी बेहद प्रिय है।"

रीना मुस्कुराते हुए बोली, "बिलकुल सही उत्तर।"

इसके बाद सभी से एक-एक कर प्रश्न पूछे गए—माता-पिता सुबह कितने बजे उठते हैं, उनकी दिनचर्या क्या है, वे दवा किस समय लेते हैं, उनके घनिष्ठ मित्र कौन हैं, उन्हें किस बात से सबसे अधिक खुशी मिलती है और किन बातों से वे व्यथित हो जाते हैं।

जब सभी उत्तर सामने आए तो परिणाम चौंकाने वाला था। लगभग हर प्रश्न का सही उत्तर बहुओं ने दिया। केवल एक प्रश्न का उत्तर किसी एक बेटे ने सही दिया था।

सीता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "देखा... मैंने पहले ही कहा था कि बहुएँ ही जीतेंगी।"

फिर उनका स्वर गंभीर हो गया।

"बेटे अपनी जिम्मेदारियों और कार्यक्षेत्र में व्यस्त रहते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन बहुएँ घर की धड़कनों के साथ जीती हैं। वे हमारी छोटी-से-छोटी आदतों, पसंद-नापसंद, दवाइयों के समय, दिनचर्या, सुख-दुःख, हमारी चिंताओं और हमारी मुस्कानों तक को अपने मन में संजो लेती हैं।"

सभी सहेलियों ने मौन सहमति में सिर हिला दिया।

सीता बोली, "मुझे लगता है कि समय आ गया है कि हम एक पुरानी कहावत को नया अर्थ दें।

अब तक हम कहते आए हैं—

'बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है।'

लेकिन आज मैं पूरे विश्वास से कहना चाहूँगी—

'बहुएँ भी बुढ़ापे की सच्ची लाठी होती हैं।'

रिश्तों की मजबूती केवल रक्त-संबंधों से नहीं मापी जाती। अपनापन, सेवा, संवेदनशीलता, सम्मान और विश्वास—यही वे आधार हैं, जिन पर परिवार की वास्तविक नींव टिकी होती है। जहाँ बहू, बेटी का स्नेह लेकर घर को अपना मान लेती है, वहाँ बुज़ुर्गों का बुढ़ापा केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण और सुखमय भी बन जाता है।

रचनाकार

सुषमा दामोदर लाहोटी (पिंकी)

बेल्लमपल्ली (तेलंगाना) 

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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