उफ़! ये कैसी विडम्बना

उफ़! ये कैसी विडम्बना

भूमिका

अक्सर हम सुनते हैं कि मोबाइल से दूर रहो, यह समय नष्ट करता है और रिश्तों में दूरी लाता है। यह बात कई परिस्थितियों में सही भी हो सकती है। लेकिन जीवन के हर सत्य का एक दूसरा पक्ष भी होता है। किसी के लिए जो वस्तु केवल मनोरंजन का साधन है, वही किसी दूसरे के लिए जीवन का संबल, अपनों से जुड़े रहने का माध्यम और अकेलेपन का सबसे विश्वसनीय साथी बन जाती है। प्रस्तुत कहानी इसी विडम्बना को अत्यंत संवेदनशील ढंग से उजागर करती है।


उफ़! ये कैसी विडम्बना

"जिस वस्तु से सब कहते हैं—'दूर रहो', वही आज सुमन के जीने का सबसे बड़ा सहारा है।"

मोबाइल आज के समय की सबसे आवश्यक वस्तुओं में से एक बन चुका है। उसने न जाने कितनी चीज़ों का स्थान ले लिया है—पर्स, घड़ी, टॉर्च, डायरी, कैमरा, डाकिया और अपनों से मिलने का सबसे सरल माध्यम। किसी-किसी के लिए तो यह जीवन जीने का सहारा भी बन जाता है।

इसी विषय पर यह छोटी-सी कहानी...

मुझे बहुत खुशी हुई जब पता चला कि मेरी बचपन की सहेली सुमन भी इसी कॉलोनी में रहने आ गई है। मैंने तुरंत एक परिचित से उसका पता लिया और बिना बताए उसे सरप्राइज़ देने पहुँच गई।

बरसों से हमारा कोई संपर्क नहीं था। मैं विदेश चली गई थी और उसके पास मेरा कोई नंबर भी नहीं था। हम दोनों बचपन की घनिष्ठ सहेलियाँ थीं। उसकी शादी मुझसे पहले हो गई थी और मैं अक्सर उसके घर जाया करती थी। उसके पति भी अत्यंत मिलनसार और हँसमुख स्वभाव के थे।

मैंने जैसे ही घंटी बजाई, सुमन ने दरवाज़ा खोला। कुछ पल तो वह मुझे देखती ही रह गई। फिर अचानक बोली, "अरे पुष्पा...!" और मुझे गले लगा लिया। वर्षों का अंतर एक पल में पिघल गया। हमारी आँखें खुशी के आँसुओं से भर आईं।

अंदर बैठते ही मैंने उत्सुकता से पूछा, "जीजाजी कैसे हैं? बच्चे कहाँ हैं? अब तो बड़े हो गए होंगे?"

वह मुस्कुराई और बोली, "तेरी जल्दी-जल्दी प्रश्न पूछने की आदत अभी भी नहीं गई।"

मैं हँस पड़ी, "अरे, बचपन की आदतें भी कहीं छूटती हैं?"

घर बहुत सुंदर और सलीके से सजा हुआ था। तभी मेरी नज़र एक कमरे की ओर गई। वहाँ उसके पति बिस्तर पर लेटे हुए थे।

मैंने पास जाकर कहा, "अरे वाह! जीजाजी, आप भी घर पर हैं। कैसे हैं?"

उन्होंने मुस्कुराने का प्रयास करते हुए कहा, "पुष्पा जी... आप कैसी हैं? नौकरी कैसी चल रही है?"

सुमन चाय बनाने रसोई में चली गई। मैं भी उसके पीछे-पीछे चली गई। वहीं मैंने धीरे से पूछा, "सब ठीक तो है?"

उसकी आँखें भर आईं।

चाय लेकर हम दूसरे कमरे में बैठे तो उसने कहना शुरू किया—

"एक रात अचानक इनका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया और इन्हें पैरालिसिस का अटैक आ गया। अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने कहा कि अगले अड़तालीस घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं। इलाज शुरू हुआ। धीरे-धीरे कुछ सुधार भी हुआ। छह महीने तक रोज़ फिजियोथेरेपी करवाई। चलना भी शुरू कर दिया था। लेकिन एक दिन घर लौटते समय दरवाज़े पर ही गिर पड़े। तब से बिस्तर पर ही हैं।"

इतना कहते-कहते वह रो पड़ी।

मेरी आँखें भी नम हो गईं।

कुछ देर बाद उसने स्वयं को सँभालते हुए कहा, "बच्चे बहुत अच्छे हैं। बेटी एक वर्ष के लिए अमेरिका गई है। दामाद भी बहुत अच्छे हैं। बेटा चेन्नई में नौकरी करता है। दोनों दूर हैं, लेकिन हमारा बहुत ध्यान रखते हैं। दवाइयाँ, फल, सब्जियाँ, दूध—सब ऑनलाइन मँगवा देते हैं। हर सप्ताह फैमिली डॉक्टर भी किसी को भेज देते हैं।"

फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"बेटी मेरे लिए एक स्मार्टफोन लेकर आई थी। उसने मुझे वीडियो कॉल करना सिखाया। अब रोज़ बच्चों और नाती-नातिनों से बात हो जाती है। लगता है जैसे वे यहीं मेरे सामने बैठे हों।"

मैंने पूछा, "जीजाजी को यह सब कब हुआ था?"

उसने धीमे स्वर में कहा, "सन् 2007 में..."

मैंने करुणा से पूछा, "तू थक नहीं जाती? कभी ऊब नहीं होती?"

वह तुरंत बोली—

"कैसी बात करती है? इस इंसान ने मुझे जीवन भर इतना प्यार, सम्मान और अपनापन दिया है। आज इन्हें मेरी ज़रूरत है तो मैं इन्हें कैसे छोड़ सकती हूँ? मेरा पूरा समय इनकी सेवा में बीत जाता है और मुझे इसमें कोई शिकायत नहीं।"

फिर उसने अपने मोबाइल को हाथ में लेते हुए कहा—

"हाँ, यह मोबाइल मेरा सबसे बड़ा साथी बन गया है। इसी से मैं बच्चों से जुड़ी रहती हूँ, रिश्तेदारों से बातें कर लेती हूँ, व्हाट्सऐप पर संदेश भेज देती हूँ, शादी-ब्याह और पारिवारिक कार्यक्रम भी वीडियो कॉल से देख लेती हूँ। जब मन बहुत अकेला होता है तो पुराने गीत चला देती हूँ और इन्हें भी सुनाती हूँ। सच कहूँ, अब यही मुझे दुनिया से जोड़े रखता है।"

मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।

घर लौटते समय मेरे मन में केवल एक ही विचार बार-बार उठ रहा था—

वास्तव में विडम्बना यही है कि जिस मोबाइल को आज अधिकांश लोग रिश्तों का दुश्मन मानते हैं, वही किसी के लिए रिश्तों को जीवित रखने का सबसे मजबूत सेतु भी बन जाता है। वस्तु अच्छी या बुरी नहीं होती, उसका उपयोग उसे अर्थ देता है।

रचनाकार



पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति










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