कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता..- विजया डालमिया

कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता..

भूमिका

जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें न समाज कोई नाम देता है, न किसी बंधन की आवश्यकता होती है। वे न रक्त से जुड़े होते हैं, न किसी औपचारिक परिचय से, फिर भी हृदय के सबसे निकट बस जाते हैं। कभी किसी मुस्कान से, कभी किसी मौन प्रतीक्षा से और कभी किसी नन्हे से स्पर्श से जन्म लेने वाले ये संबंध हमें यह एहसास कराते हैं कि प्रेम का सबसे सुंदर रूप वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के केवल अपनापन बाँटता है।

आख़िर ऐसा क्या होता है कि एक अनजाना साथ भी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है? और जब वह साथ अचानक छूट जाए, तो क्यों प्रकृति का सारा सौंदर्य भी फीका लगने लगता है? आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी ही भावपूर्ण कहानी, जो यह सिखाती है कि सच्चे रिश्तों की पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके एहसास से होती है।

कहानी

कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता...

रंग-बिरंगी फूलों की झालर भी आज नेहा के दिल को नहीं लुभा रही थी। कितने दिनों से उसने उसे नहीं देखा था। पिछले कुछ दिनों से जब भी वह अपनी बालकनी में आती, सामने फैली हरियाली को देखकर उसका मन भी हरा-भरा हो उठता।

अभी कुछ ही दिन पहले वह इस नए घर में शिफ्ट हुई थी। घर क्या था, मानो फूलों की एक वादी हो। भोर की पहली किरण के साथ तरह-तरह के पक्षियों का मधुर कलरव उसे बहुत भाता। वह बालकनी में खड़ी होकर उनकी बोली समझने की कोशिश करती।

खुद गुनगुनाने की शौकीन नेहा अक्सर गाती—

"ऐ अजनबी, तू भी कभी आवाज़ दे कहीं से..."

यह उसका सबसे प्रिय गीत था। जैसे ही वह गुनगुनाती, एक खूबसूरत-सा परिंदा तेज़ी से उड़ता हुआ उसके पास आ जाता। पहली ही मुलाकात में उसे देखकर नेहा का मन खिल उठा था। हरे रंग की चमकदार गर्दन, लाल तीखी चोंच और मासूम-सी आँखें... कितना प्यारा, कितना अद्भुत!

मुस्कुराते हुए उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। वह भी निडर होकर उसके पास आ बैठता, मानो अपनी ही भाषा में उससे बातें कर रहा हो। धीरे-धीरे यह रोज़ का सिलसिला बन गया। नेहा ने प्यार से उसका नाम रख दिया— हीरामन।

अब हर सुबह हीरामन उसकी प्रतीक्षा करता, या शायद नेहा ही उसकी प्रतीक्षा करती। दोनों का यह अनकहा साथ दिन की सबसे खूबसूरत शुरुआत बन गया था। एक इंसान और एक नन्हे परिंदे के बीच कब स्नेह का रिश्ता बन गया, दोनों ही नहीं जान पाए।

लेकिन अचानक एक दिन हीरामन आना बंद हो गया।

एक दिन... दो दिन... फिर पूरे सात दिन बीत गए।

रंग-बिरंगी फूलों की झालर, सुबह की सुनहरी धूप और खुला आसमान... सब कुछ जैसे सूना-सूना लगने लगा। नेहा की निगाहें हर सुबह उसी डाल पर टिक जातीं, जहाँ बैठकर हीरामन उसका गीत सुना करता था। मन में अनगिनत आशंकाएँ उठतीं— कहीं वह किसी शिकारी का शिकार तो नहीं हो गया? कहीं घायल तो नहीं हो गया?

आठवें दिन, भोर की शांति में अचानक वही चिर-परिचित पंखों की आहट सुनाई दी।

नेहा का चेहरा खुशी से खिल उठा। उसने अपने हाथ फैला दिए और उसके होंठों से अनायास निकला—

"कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी..."

हीरामन उड़कर उसकी हथेली पर आ बैठा। उसकी एक टाँग पर हल्का-सा घाव था। शायद वह किसी दुर्घटना का शिकार हो गया था। नेहा की आँखें भर आईं। उसने बहुत प्यार से उसकी गर्दन सहलाई। हीरामन ने अपनी नन्ही-सी चोंच से उसकी उँगलियों को हल्के से छुआ, मानो कह रहा हो—

"देखो... मैं लौट आया हूँ।"

उस स्पर्श में शब्द नहीं थे, लेकिन अपनापन था। नेहा समझ गई कि प्रेम भाषा का मोहताज नहीं होता।

उसने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा। फूल फिर पहले से अधिक रंगीन लग रहे थे। धूप फिर सुनहरी हो उठी थी और पक्षियों का कलरव मानो जीवन का सबसे मधुर संगीत बन गया था।

सच ही तो है—

कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता, फिर भी वही रिश्ते दिल में सबसे गहरी जगह बना लेते हैं।

समीक्षा

Conversation with Gemini

सुंदर कथा लिखी है आपने, धाराप्रवाह चित्रण👌


निश्छल प्रेम को केंद्रित करके यदि कुछ लिखा जाए तो फिर उसका आकर्षण दिव्य ही होता है।


नेहा और चमकदार गर्दन वाले पंछी का निर्मल सरल नेह सदैव ऐसे ही बना रहे और आप अपनी कल्पना शक्ति से इसपर पार्ट 2/3/4 का जल्दी विमोचन करे।।


आगे क्या होगा?


जानने की उत्सुकता के साथ

आपके पाठकगण🙏


प्रेम है तो झूठन भी ग्राह्य है।

प्रेम है तो क्रोध भी शिरोधार्य है।

प्रेम है तो त्याग भी प्राप्ति है।

प्रेम है तो दूरी भी पास है।

प्रेम है तो विरह भी आस है।

प्रेम है तो कष्ट भी सुख है।

प्रेम है तो धोख़ा भी विश्वास है।

प्रेम है तो त्यागना भी आलिंगन है।

प्रेम है तो मौन भी मुखर है।

प्रेम है तो झगड़ा भी सम्मान है,सत्कार है।

- आनंद भैया

Create an image with header

समीक्षा 



रचनाकार

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका, महिला लेखिका प्रकोष्ठ, 

उलझन सुलझन

समीक्षक

आनंद भैया

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति










Comments

Popular posts from this blog

निर्णय का निर्वाण (लघुकथा)

बाला और कचनार - सुनिता मीणा

एक घटना, दो पहलू