भीगे पल
भीगे पल
भूमिका
कुछ मुलाकातें समय की धारा में बहकर भी स्मृतियों के तट पर सदैव जीवित रहती हैं। वे किसी रिश्ते का नाम नहीं माँगतीं, फिर भी जीवन का सबसे गहरा अहसास बन जाती हैं। प्रेम कभी-कभी मिलन से नहीं, त्याग से अपनी ऊँचाई पाता है। प्रस्तुत कहानी 'भीगे पल' ऐसे ही दो संवेदनशील हृदयों की कथा है, जहाँ बरसात केवल धरती को नहीं, मन के उन कोनों को भी भिगो देती है जिन्हें जिम्मेदारियों ने वर्षों से सूखा रखा था। आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी कहानी, जो समाप्त होकर भी लंबे समय तक भीतर गूँजती रहती है।
कहानी : भीगे पल
बरसते, भीगते मौसम के साथ शिल्पा का मन भी आज न जाने क्यों भीगता चला जा रहा था। यूँ तो उसने कभी मौसम के बदलाव का अपने भीतर कोई विशेष प्रभाव महसूस नहीं किया था। जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते-निभाते न जाने कितने मौसम यूँ ही गुजर गए और उसे पता भी नहीं चला। उसकी जिंदगी एक सीधी, सरल रफ्तार से चल रही थी। पर प्रकृति का प्रत्येक क्रियाकलाप एक निश्चित विधान के अनुसार चलता है। हम उससे और वह हमसे कब जुड़ जाती है, इसका आभास भी नहीं होता।
इसी बरसात के मौसम में एक दिन, जब वह कैब के इंतजार में खड़ी थी, तभी न जाने कहाँ से वह सामने आ खड़ा हुआ और बोला,
"आप कैब का इंतजार कर रही हैं?"
शिल्पा ने नजरें दूसरी ओर फेर लीं।
उसने फिर पूछा,
"आपको कहाँ जाना है?"
शिल्पा ने थोड़ी बेरुखी से उत्तर दिया,
"स्टेशन।"
बिना किसी भूमिका के उसने कहा,
"मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो गया है। मैं कैब बुक नहीं कर पाया। यदि आपको आपत्ति न हो तो क्या मैं आपके साथ चल सकता हूँ? मुझे भी वहीं जाना है।"
उसने यह बात इतनी शांति और ठहराव से कही कि शिल्पा इंकार न कर सकी।
कुछ ही देर में कैब आ गई। संयोग से सामने वाली सीट की खिड़की से पानी रिस रहा था। वह सामने बैठने बढ़ा ही था कि न जाने कैसे शिल्पा के मुँह से निकल पड़ा—
"कोई बात नहीं... आप पीछे बैठ सकते हैं।"
वह तुरंत पीछे आकर बैठ गया।
कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर उसने कहा,
"थैंक यू।"
जब कोई उत्तर नहीं मिला तो मुस्कुराते हुए बोला,
"बात करने पर तो टैक्स नहीं लगता न?"
शिल्पा अनायास मुस्कुरा उठी।
उसने आत्मीयता से कहा,
"मैं शिखर... और आप?"
शिल्पा फिर खामोश रही। बरसती बूंदों में कहीं खोई हुई।
तभी कैब चालक ने रेडियो पर गीत चला दिया—
"तुम जो मिल गए हो, तो यूँ लगता है कि जहाँ मिल गया..."
शिखर भी उसके साथ गुनगुनाने लगा। उसकी आवाज इतनी मधुर और सधी हुई थी कि सीधे दिल में उतरती चली गई। शिल्पा ने कनखियों से उसे देखा। गोरा-चिट्टा रंग, हल्की-सी मूँछ, सलीकेदार हेयर स्टाइल—मानो किसी फिल्म का नायक हो। कुल मिलाकर वह बेहद आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था।
अब शिल्पा सहज होने लगी थी। न जाने क्यों चाह रही थी कि शिखर उससे कुछ और पूछे। पर वह बाहर गिरती बारिश को देख रहा था।
अचानक शिल्पा स्वयं बोल उठी—
"मैं... शिल्पा।"
शिखर मुस्कुराया। बस, फिर बातों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो स्टेशन आने तक थमा ही नहीं। वह स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी कि एक अजनबी से इतनी जल्दी इतना अपनापन कैसे हो गया।
स्टेशन पहुँचने पर शिखर ने कहा—
"आपसे मिलकर सचमुच बहुत अच्छा लगा। आज से तुम मेरी दोस्तों की सूची में शामिल हो। लेकिन... फोन नंबर तो दिया ही नहीं।"
वह 'आप' से सीधे 'तुम' पर आ चुका था।
शिल्पा मुस्कुराई—
"फिर कभी।"
शिखर बोला—
"ठीक है, मेरा तो ले लो। शायद कभी काम आ जाए।"
और अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमा दिया।
समय बीत गया।
एक दिन यूँ ही बालकनी में बैठी थी कि कहीं वही गीत बज उठा—
"तुम जो मिल गए हो..."
शिखर की याद अनायास ताजा हो गई। उसने पर्स से कार्ड निकाला और नंबर मिला दिया। एक घंटी जाते ही उसने कॉल काट दिया।
पर कुछ ही क्षण बाद फोन बज उठा।
"अरे, शिल्पा! कैसी हो?"
वही अपनापन... वही आत्मीयता...
बस, फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया।
जो बातें वह किसी से नहीं कह पाती थी, वे सब सहजता से शिखर से कह देती। उसकी सुबह, दोपहर और शाम—सब पर शिखर का अधिकार-सा हो गया था। रातों में वह सपनों का स्थायी मेहमान बन चुका था।
...
शिल्पा का अपना संसार बहुत छोटा था। गाँव में रहने वाली माँ और छोटी बहन शुचि। पिता का देहांत उसके कॉलेज के दिनों में ही हो गया था। जीवन की आवश्यकताएँ उसे पुणे ले आई थीं। संघर्षों के बाद उसने स्वयं को स्थापित किया था। जिम्मेदारियों ने उसके भीतर के सारे कोमल भाव जैसे कहीं दबा दिए थे। शिखर ने उन्हीं भावनाओं से उसका फिर परिचय कराया।
कुछ दिनों बाद शुचि का फोन आया। वह माँ को लेकर कुछ दिन उसके पास रहने आने वाली थी।
माँ के आने के बाद उसकी दिनचर्या बदल गई। फोन पर लंबी बातें अब सहज नहीं रहीं। एक दिन माँ ने मुस्कुराकर पूछा—
"कौन है? कभी घर भी बुला ले। हम भी मिल लेंगे।"
शिल्पा ने केवल इतना कहा—
"देखते हैं..."
कैसे समझाती कि उनका रिश्ता कोई नाम नहीं माँगता, फिर भी सब कुछ था।
...
एक दिन फिर वही बरसता मौसम था।
अचानक माँ ने आवाज लगाई—
"बेटा, तुझसे मिलने कोई आया है।"
शिल्पा ड्राइंग रूम में पहुँची और ठिठक गई।
सामने शिखर अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए खड़ा था।
वह कुछ कह भी नहीं पाई थी कि शिखर हँसते हुए बोला—
"आइए मैडम! आपका ही घर है। इजाजत हो तो बैठ जाऊँ?"
धीरे-धीरे वह माँ और शुचि से भी इस तरह घुल-मिल गया जैसे वर्षों का परिचित हो।
माँ ने उसकी पसंद का भोजन बनाया। जाते समय उसने मुस्कुराकर कहा—
"माँ, जब तक आप यहाँ हैं, इतना स्वादिष्ट खाना मैं मिस नहीं कर सकता।"
शिल्पा उसे गेट तक छोड़ने गई।
उस क्षण शिखर की आँखों में इतना स्नेह था कि शिल्पा नजरें झुका गई। पहली बार उसने महसूस किया कि नजरें भी बिना शब्दों के कितना कुछ कह देती हैं।
घर लौटते ही माँ बोली—
"बहुत ही अच्छा और समझदार लड़का है शिखर। अब तो मेरी चिंता ही खत्म हो गई।"
शिल्पा केवल मुस्कुरा दी।
उसे कहाँ पता था कि आने वाला समय उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा लेकर आने वाला है।
...
अगले दिन माँ ने शिखर का फोन नंबर माँगा। शिल्पा ने खुशी-खुशी दे दिया। उसे लगा, शायद माँ उसके रिश्ते को स्वीकार करना चाहती हैं।
लेकिन उसी दोपहर शिखर का फोन आया।
उसकी आवाज आज बदली हुई थी।
"मैं तुमसे अभी मिलना चाहता हूँ।"
दोनों कॉफी हाउस में मिले।
शिखर ने जो कहा, उसे सुनकर शिल्पा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
माँ ने शिखर के लिए शिल्पा का नहीं, बल्कि शुचि का रिश्ता माँगा था।
कुछ देर बाद शिल्पा ने काँपती आवाज में कहा—
"शुचि मुझसे छोटी है। अगर उसे कुछ पसंद आ जाए, तो मुझे अपनी पसंद छोड़नी ही होगी।"
शिखर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
"मैं कोई वस्तु नहीं हूँ, शिल्पा। मैं भी भावनाओं वाला इंसान हूँ। मेरी साँसें तुम्हारे नाम से चलती हैं, मेरी मुस्कान तुम्हारी बातों से खिलती है और मेरी आँखें तुम्हारे सपनों से जीती हैं।"
इतना कहते-कहते उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े और शिल्पा की हथेली भीग गई।
पर शिल्पा...
वह तो मानो वहाँ होकर भी वहाँ नहीं थी।
जिम्मेदारियों का घना जंगल उसके सामने खड़ा था।
उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया, पर्स उठाया और कहा—
"हम एक-दूसरे को इतना समझते हैं कि अब हमारे बीच किसी प्रश्न या उत्तर की कोई आवश्यकता नहीं रही।"
शिखर सब समझ गया।
शिल्पा ने हाथ जोड़ दिए।
उसकी आँखों में प्रार्थना, उम्मीद और बिछड़ते प्रेम की वेदना एक साथ तैर रही थी।
लेकिन शिल्पा ने पलटकर नहीं देखा।
कभी नहीं।
...
समय अपनी गति से चलता रहा।
दिन बदले, महीने बदले, वर्ष बदले... और रिश्तों ने भी नए रूप ले लिए।
अब माँ उसी के साथ रहती हैं। कोई कुछ नहीं पूछता।
शब्द खामोश हो चुके हैं।
भावनाएँ जिम्मेदारियों की चादर ओढ़कर सो चुकी हैं।
लेकिन जब-जब बरसात होती है, उसके वे भीगे पल फिर जाग उठते हैं।
बारिश की हर बूँद उसका साथ देती है और अनायास उसके होंठों पर वही गीत उतर आता है—
"तुम जो मिल गए हो..."
— विजया डालमिया
संपादक, मेरी निहारिका
कहानी के निहित भाव
प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप अधिकार नहीं, त्याग होता है।
कुछ रिश्ते नाम के मोहताज नहीं होते; वे आत्मा के स्तर पर जुड़े होते हैं।
जिम्मेदारियाँ अनेक बार व्यक्ति को अपने निजी सुखों का बलिदान देने के लिए विवश कर देती हैं।
सच्चा प्रेम स्वार्थ से नहीं, दूसरे के सम्मान और सुख से परिभाषित होता है।
जीवन में कुछ अधूरी कहानियाँ ही सबसे गहरी स्मृतियाँ बन जाती हैं।
बरसात यहाँ केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि भीगे हुए मन, अधूरे प्रेम और अनकहे भावों का सशक्त प्रतीक है।
त्याग का दर्द समय के साथ कम नहीं होता, वह केवल मौन होकर स्मृतियों में बस जाता है।
रचनाकार



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