नन्ही रोशनी - विजया डालमिया

 नन्ही रोशनी

भूमिका

जीवन में कुछ मुलाकातें संयोग नहीं, ईश्वर का स्नेहिल उपहार होती हैं। वे बिना किसी पूर्व परिचय के हमारे जीवन में आती हैं और धीरे-धीरे हमारे भीतर जमी उदासी, अकेलेपन और निराशा को प्रेम, अपनत्व और विश्वास के रंगों से भर देती हैं। 'नन्ही रोशनी' ऐसी ही एक हृदयस्पर्शी कहानी है, जिसमें एक मासूम बच्ची की सहज निश्छलता एक अकेले व्यक्ति के सूने जीवन को नई दिशा देती है। यह केवल दो व्यक्तियों के मिलने की कथा नहीं, बल्कि उन रिश्तों की कहानी है जो रक्त से नहीं, संवेदना, करुणा और आत्मीयता से जन्म लेते हैं।

कहानी का प्रत्येक प्रसंग पाठक को भावनाओं की उस यात्रा पर ले जाता है, जहाँ मानवता सबसे बड़ा धर्म बनकर सामने आती है। अंत तक पहुँचते-पहुँचते यह कथा आँखों को नम कर देती है और हृदय में यह विश्वास जगा देती है कि ईश्वर जब किसी का एक सहारा छीनता है, तो कहीं न कहीं किसी दूसरे के रूप में नई रोशनी भी अवश्य भेजता है।


कहानी

नन्ही रोशनी

यूँ तो सुबह रोज़ होती है, पर वह सुबह मेरी ज़िंदगी की सबसे प्यारी और अनमोल सुबह बन गई।

मैं बालकनी में बैठा चाय के साथ अख़बार पढ़ने का आनंद ले रहा था। तभी किसी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी—

"मम्मी, लगी तो नहीं आपको? उठो न..."

मैंने देखा, आठ-नौ वर्ष की एक नन्ही बच्ची अपनी माँ को छोटे-छोटे हाथों से सहारा देकर उठाने की कोशिश कर रही थी। पास ही एक ट्रक खड़ा था। उसमें अधिक सामान नहीं था, फिर भी ट्रक चालक सामान उतारने से साफ़ मना कर चुका था। माँ-बेटी दोनों असहाय और परेशान दिखाई दे रही थीं।

पहले तो मैंने सोचा—मुझे क्या?

लेकिन तभी बच्ची ने विनम्र स्वर में कहा—

"भैया जी, आप सामान उतार दीजिए न।"

इतना सुनते ही ट्रक चालक झल्लाकर बोला—

"ए छोकरी! यह हमारा काम नहीं है।"

उसकी बात सुनते ही भीतर कुछ खौल उठा। मैं तुरंत बाहर निकला और दृढ़ स्वर में कहा—

"सामान तो आपको ही उतारना होगा।"

मेरी आवाज़ की सख़्ती देखकर वह सकपका गया। धीरे से बोला—

"बाबूजी... अगर आप भी थोड़ी मदद करवा देते तो..."

मैंने कुछ नहीं कहा, पर शायद मेरी आँखों ने सब कह दिया था। वह तुरंत सामान उतारने लगा।

तभी वह बच्ची मेरे पास आई और मुस्कुराकर बोली—

"थैंक्यू अंकल! मैं नन्ही... और आप?"

मैं मुस्कुराया—

"मैं... मैं... अंकल।"

वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। मेरा हाथ पकड़कर अपनी माँ से बोली—

"मम्मी! ये अंकल बहुत अच्छे हैं। बिल्कुल अपने जैसे लगते हैं।"

उसकी यह बात सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं। सामने देखा तो सादगी और सौम्यता की प्रतिमूर्ति-सी उसकी माँ हाथ जोड़कर खड़ी थीं।

"नमस्ते... आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।"

मैंने सहज भाव से कहा—

"कोई बात नहीं। अभी यह सामान घर के भीतर भी तो रखना होगा।"

इतना सुनते ही नन्ही उछल पड़ी—

"जी अंकल! आइए, आप भी हमारी हेल्प कीजिए।"

उसने अपनी गोल-गोल आँखें मटकाते हुए इतनी मासूमियत से कहा कि मैं चाहकर भी मना न कर सका।

यही थी नन्ही से मेरी पहली मुलाकात।


अगले दिन सुबह-सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"अंकल... अंकल..."

मैं गहरी नींद में था। हड़बड़ाकर दरवाज़ा खोला तो सामने मुस्कुराती हुई नन्ही खड़ी थी।

"गुड मॉर्निंग अंकल!"

"वेरी गुड मॉर्निंग बेटा।"

मैं कुछ पूछता, उससे पहले उसकी निगाहें मेरे अस्त-व्यस्त घर पर घूमने लगीं।

फिर उसने पूछा—

"अंकल, बाकी लोग कहाँ हैं?"

उस प्रश्न का उत्तर उस समय मेरे पास नहीं था।

मैंने बात टालते हुए कहा—

"अरे, पहले बैठो तो सही।"

वह तुरंत बोली—

"आप इतना देर से उठते हो? आपकी मम्मी आपको डाँटती नहीं क्या?"

मैं चुप रह गया।

शायद उसने मेरी ख़ामोशी पढ़ ली। अचानक बोली—

"मैं अभी आती हूँ। आप गेट बंद मत करना।"

कुछ ही देर बाद वह गरमागरम पोहे, प्लेट और चम्मच लेकर लौट आई।

"चलो अंकल, आज हम साथ-साथ पोहे खाएँगे।"

मैं कुछ कह पाता, उससे पहले ही उसने अपने हाथों से पहला कौर मुझे खिला दिया।

उस दिन मुझे लगा जैसे वर्षों बाद किसी ने मुझे अपनेपन से छुआ हो।

इतने स्वादिष्ट पोहे मैंने पहले कभी नहीं खाए थे। शायद स्वाद पोहों का नहीं, उस मासूम स्नेह का था।

अब यह रोज़ का क्रम बन गया।

धीरे-धीरे उसने मेरी दिनचर्या समझ ली। वह उसी हिसाब से आने लगी। मेरे एकाकी जीवन में वह सचमुच खुशियों की ठंडी बयार बनकर आई थी। मेरा सूना घर अब घर जैसा लगने लगा था। उसकी खिलखिलाहट दीवारों में भी जीवन भर देती थी।

पहले वह आते ही मेरे बिखरे घर को अपने नन्हे हाथों से समेटने लगती। फिर मुझे स्वयं संकोच होने लगा और मैंने अपना घर व्यवस्थित रखना शुरू कर दिया।

बिना कुछ कहे वह मुझे अनुशासन और व्यवस्थित जीवन का पाठ पढ़ा रही थी।

धीरे-धीरे उसमें मुझे हर रिश्ता दिखाई देने लगा—कभी वह माँ की तरह समझाती, कभी बच्ची बनकर शरारत करती और कभी मित्र की तरह हँसी बिखेर देती।


एक दिन वह उदास थी।

मैंने पूछा—

"क्या हुआ?"

धीरे से बोली—

"मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है।"

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

"चलो, आज तुम्हारे घर चलते हैं।"

घर में प्रवेश करते ही अगरबत्ती की भीनी-भीनी सुगंध और धीमी स्वर में बजता 'ॐ' मन को शांति दे गया।

नन्ही पुकार उठी—

"मम्मी! देखो, हम किसे लेकर आए हैं।"

कुछ ही देर में उसकी माँ सामने थीं।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

"बैठिए। यह तो पूरे समय आपकी ही बातें करती रहती है।"

मैंने उनकी तबीयत पूछी।

वे मुस्कुरा दीं—

"मैं ठीक हूँ। यह बच्ची ज़रा जल्दी घबरा जाती है।"

नन्ही बोली—

"अंकल, मैं आपके लिए चाय बनाऊँ?"

मैंने मना किया तो तुरंत बोली—

"ऐसा नहीं चलेगा। आप पहली बार हमारे घर आए हैं।"

मैं हँस पड़ा—

"मैं तो रोज़ ही तुम्हारे हाथों का स्वादिष्ट खाना खाता हूँ।"

यह सुनते ही उसकी माँ संकोच से मुस्कुरा उठीं।

चाय पीते-पीते उन्होंने कहा—

"नन्ही आपको बहुत मानती है।"

मैंने देखा—नन्ही अपनी माँ के गले में बाँहें डाले शरारती मुस्कान के साथ मुझे देख रही थी।

तब तक मैं समझ चुका था कि ये दोनों भी मेरी तरह जीवन की कठिन राह पर अकेली थीं।


समय यूँ ही बीतता रहा।

मेरी सुबह की पहली किरण से लेकर रात के अंतिम तारे तक, हर क्षण नन्ही की उपस्थिति से जगमगाने लगा।

फिर एक दिन वह घबराई हुई दौड़ती आई—

"अंकल, जल्दी चलिए! मम्मी को पता नहीं क्या हो गया है।"

मैं तुरंत उनके घर पहुँचा। वे बेहोश पड़ी थीं।

हम उन्हें अस्पताल ले गए।

सभी जाँचें हुईं।

दो दिन बाद डॉक्टर ने मुझे अपने कमरे में बुलाकर कहा—

"आप इन्हें बहुत देर से लाए हैं। इन्हें कैंसर की अंतिम अवस्था है।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

कमरे में पहुँचा तो उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

"मुझे माफ़ कर दीजिए। शायद मैं बिना अधिकार के इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी आपके कंधों पर रख रही हूँ। पर मेरे पास कोई और नहीं है। मैं जानती थी कि मेरी ज़िंदगी अब बहुत लंबी नहीं है। भगवान से बस यही प्रार्थना करती रही कि मेरी नन्ही को कोई अपना मिल जाए। गाँव में हमारी बहुत-सी संपत्ति है, लेकिन वही हमारी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। इसलिए हमें रातों-रात यहाँ आना पड़ा।"

उन्होंने मेरी ओर आशाभरी निगाहों से देखा।

उन आँखों की बेबसी ने मुझे भीतर तक छू लिया।

मैंने उनका हाथ थाम लिया।

"नन्ही पहले भी मेरी थी और आगे भी मेरी ही रहेगी। आपने मुझे कोई बोझ नहीं, बल्कि जीवन का सबसे सुंदर उपहार दिया है। बस... नन्ही से यह सब कैसे कहूँगा?"

मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि नन्ही दौड़कर मुझसे लिपट गई।

रोते हुए बोली—

"अंकल... मुझे सब पता है।"

मैं स्तब्ध रह गया।

उस नन्ही-सी बच्ची को अपनी बाँहों में भरकर मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।

मेरे होंठों से केवल इतना ही निकला—

"हे प्रभु! यह तेरी कैसी लीला है! मेरी सूनी ज़िंदगी में तूने सचमुच एक नन्ही रोशनी भेज दी।"


समर्पण

ए दोस्त! बता तेरा क्या नाम रखूँ?
सपना रखूँ? नहीं... वह अधूरा रह जाएगा।
दिल रखूँ? नहीं... वह टूट जाएगा।
चल, तेरा नाम 'साँस' ही रख देता हूँ,
क्योंकि अब तू मेरे जीवन की हर साँस के साथ रहेगा।


विजया डालमिया


सीख

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चे रिश्ते रक्त के नहीं, संवेदना और अपनत्व के धागों से बनते हैं। एक छोटी-सी करुणा किसी के जीवन की दिशा बदल सकती है। कभी-कभी ईश्वर हमारे जीवन की रिक्तता को भरने के लिए किसी मासूम मुस्कान, किसी नन्हे हाथ या किसी अनजाने रिश्ते को भेज देता है। इसलिए जीवन में मानवता, सहानुभूति और अपनापन कभी मत छोड़िए, क्योंकि यही वे दीप हैं जो किसी और के जीवन में ही नहीं, हमारे अपने जीवन में भी 'नन्ही रोशनी' बनकर उजाला भर देते हैं।

रचयिता


पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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