साथ-साथ - विजया डालमिया

साथ-साथ

भूमिका

कुछ रिश्ते कभी कहे नहीं जाते, फिर भी जीवन भर साथ चलते रहते हैं। कुछ प्रेम-पत्र कभी भेजे नहीं जाते, फिर भी वे दो धड़कनों के बीच मौन संवाद बनकर जीवित रहते हैं। क्या प्रेम केवल शब्दों का मोहताज है, या खामोशियाँ भी अपने भीतर पूरे जीवन का संगीत समेटे रहती हैं?

"साथ-साथ" ऐसी ही दो आत्माओं की कथा है, जो एक-दूसरे के अत्यंत निकट होकर भी अपने मन की बात कहने का साहस नहीं जुटा पातीं। यह कहानी पाठक को उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है—यदि प्रेम दोनों ओर था, तो फिर दूरी किस बात की थी? क्या नियति ने उन्हें अलग रखा, या उनकी अपनी चुप्पियों ने?

हर पंक्ति के साथ यह जिज्ञासा गहराती जाती है कि क्या दो अनकहे प्रेम अंततः एक-दूसरे तक पहुँच पाएँगे, या उनके बीच केवल अधूरे एहसास ही रह जाएँगे? उत्तर जानने के लिए आइए, प्रवेश करें एक ऐसी भावनात्मक यात्रा में, जहाँ शब्द कम हैं, पर संवेदनाएँ अथाह हैं।

कहानी

जान से प्यारे, सबसे प्यारे... प्यार ही प्यार...**

आज बड़ा ही अजीब लग रहा है, यूँ तुमसे मुखातिब होते हुए। यूँ तो खयालों में तुम्हें लाकर हमेशा ही तुमसे बातें करती रही हूँ, पर आज ख़त को माध्यम बनाकर दिल की बातें तुमसे कहना चाहती हूँ। इजाज़त है न मुझे?

पता नहीं... तुम्हें कैसा लगेगा? पर एक बात जान लो—ये सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं हैं; ये मेरे एहसास हैं, जो शब्दों में ढल गए हैं। मेरी वह लंबी खामोशी, जिसे तुम कभी सुन ही नहीं पाए, या यूँ कहो, कभी पढ़ना ही नहीं चाहा। ये वही अनकही बातें हैं, जो मैं हमेशा तुमसे कहती रही।

हालाँकि लिखना बहुत भारी काम है। संवेदनाओं को शब्दों में ढाल भी दूँ, तो अनुभूतियों को कैसे बता पाऊँगी? फिर भी...

तुम्हें याद है... हमारी वह पहली मुलाकात? अचानक तुम्हारा मेरे सामने आ जाना?

कहाँ से याद होगा तुम्हें? क्योंकि वह सब तो मेरे ज़ेहन में है। तुमने तो मुझे नोटिस भी नहीं किया था, पर मैं तुम्हारी बातें सुनते-सुनते तुम्हें एकटक देखे जा रही थी। तुम्हारे घुँघराले, घने बाल और उस पर पतली डंडी वाला चश्मा—कितना खूबसूरत बना रहा था तुम्हें! और जब प्लेट में रखे फ्रूट्स तुमने नज़ाकत से खाने शुरू किए, तो मुझे मन ही मन हँसी आने लगी। मैं ठहरी बिना धोए फ्रूट्स कपड़े से पोंछकर खाने वाली।

तुम साँवले थे, मगर तीखी नाक वाले; और नज़र... वह तो शायद हमेशा से ही तेज़ थी। बस मुझे ही कभी नहीं देख पाई।

उसके बाद जब कभी तुम घर पर पापा से मिलने आते, सबसे पहले मैं ही तुम्हें नज़र आती। पर तुमने फिर भी मुझे नहीं देखा। बस पापा और तुम कैरम खेलते रहते।

पापा ने बताया था कि रास्ते में तुमने किस तरह उनकी मदद की और फिर उन्हें घर तक ले आए। तभी से तो तुम दोनों... अरे नहीं-नहीं, हम तीनों जुड़े। पर तुमने मुझे कभी जोड़ा ही नहीं।

फिर भी मैं तुमसे, तुम्हारी बातों से, तुम्हारी ज़िंदगी से जुड़ती चली गई। जब तुम नहीं होते, तो पापा से तुम्हारी बातें कुरेद-कुरेदकर पूछती रहती। उन्हें भी बड़ा मज़ा आता बताने में, क्योंकि मेरे साथ-साथ उनकी नज़रों में भी तो तुम हीरो ही थे—उनके सबसे अच्छे दोस्त।

एक दिन तुम्हें बहुत भूख लगी थी। पापा ने कहा,

"रिया, जल्दी से प्रमोद के लिए कुछ ले आओ।"

मैं खुशी में समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या बनाऊँ। तभी याद आया, पापा कहते थे—

"उसे वेजिटेबल उपमा बहुत पसंद है।"

बस, फटाफट बनाकर ले आई। हर कौर के साथ तुम्हें बलिहारी नज़रों से निहारती रही। जब मैंने पूछा—

"कैसा बना?"

तो तुमने कहा—

"हाँ... ठीक-ठाक ही है।"

पर मुझे पता था, उस दिन जितना अच्छा उपमा मुझसे कभी नहीं बना। क्योंकि उसके बाद से पापा हमेशा कहते—

"बेटा, प्रमोद वाला उपमा बनाना।"

और मुझे हँसी आ जाती।

एक दिन पापा घर पर नहीं थे। तुम आए और लौटने लगे। मैंने थोड़ा-सा चिढ़कर कहा—

"मैं तो हूँ न!"

तब पहली बार तुमने मुझे गौर से देखा और कहा—

"चलो, खेलते हैं।"

हम काफी देर तक खेलते रहे। तुम हर बार हार गए और मैं जीत गई। ताज्जुब हुआ कि ऐसा कैसे?

कुछ दिनों से तुम्हारा आना बहुत कम हो गया था। मेरे पूछने पर पापा ने बताया—

"उसे किसी से प्यार हो गया है, पर वह उसे कह नहीं सकता।"

मेरे दिल में एक हूक-सी उठी। फिर भी हँसते हुए मैंने कहा—

**"इतनी बातें करने वाला यही एक बात नहीं कह पाया?"**

पापा का जवाब था—

"यही तो सबसे मुश्किल बात है, क्योंकि इसे कहने के लिए हिम्मत, ईमानदारी और पारदर्शिता चाहिए होती है।"

फिर मैंने कुछ नहीं कहा।

एक दिन पापा की तबीयत ठीक नहीं थी। तुमने बिना देर किए मुझे आवाज़ लगाकर कहा—

"हम अभी डॉक्टर के यहाँ से आते हैं।"

मुझे बहुत अच्छा लगा। तुम कई दिनों तक उनकी सेवा करते रहे, पर तुम्हारा रवैया मेरे प्रति कभी नहीं बदला। वही नीरसता... वही बेरुख़ी।

मुझमें ऐसा कुछ था भी नहीं, जो तुम्हें पसंद आता। मेरा प्यार एकतरफ़ा था।

फिर भी...

अब मैं कुछ दिनों के लिए चाची के यहाँ जा रही हूँ। दुआ करती हूँ कि तुम्हारा प्यार तुम्हें मिल जाए... जो तुम्हारे लिए कभी अपनी थी ही नहीं।

—रिया

प्रिय रिया,

तुमने जो कहा, मैंने हमेशा सुना। तुम्हारी खामोशी को मैंने खामोश रहकर ही पढ़ा।

तुमसे पहली मुलाकात मैं कभी भूल नहीं पाया। दरवाज़ा खुलते ही एक चंचल, मगर परेशान-सी नज़र मुझे एकटक देख रही थी। वे निगाहें सीधे मेरे दिल में उतर गई थीं।

तुम्हारी वह निश्छल हँसी आज भी मेरे कानों में किसी मधुर संगीत की तरह गूँजती है। बात-बात पर तुम्हारा मज़ाक करना, हर साधारण-सी बात को ख़ास बना देना, किसी की छोटी-से-छोटी भावना की भी कद्र करना—यह सब मैं तुमसे ही सीख रहा था।

तुम्हें नहीं पता, एक दिन जब मैं आया, तब तुम भजन गा रही थीं। उसे सुनकर मैं तुम्हारी गायकी का प्रशंसक हो गया, और उसी दिन तुम्हारा वेजिटेबल उपमा खाकर तुम्हारी पाक-कला का भी।

शायद मुझे तारीफ़ करना नहीं आता।

उस दिन तुम्हें घर पर अकेली पाकर मैं लौटने ज़रूर लगा था, पर दिल में ख्वाहिश थी कि तुम मुझे रोक लो।

तुम पूरी ईमानदारी से खेल रही थीं, पर मेरा ध्यान तो पूरी तरह तुम्हारी ओर था। यही वजह थी कि मैं जीत नहीं पाया। सच कहूँ, तुमसे हारकर भी मुझे जो खुशी मिल रही थी, वह तुम क्या जानो?

मेरे बारे में इतना कुछ जानने वाली यह कभी नहीं समझ पाई कि कोई खामोश रहकर, बिना नज़रें मिलाए, बिना कुछ जताए भी किसी को चाह सकता है।

उस दिन के बाद मैं खुद घबरा गया था कि कहीं पापा मेरी उन नज़रों को न पढ़ लें, जिन्हें मैं खुद से भी छिपाकर रखता था। इसलिए कुछ दिनों तक आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

संकेतों के माध्यम से उनके मन को टटोलना चाहा, पर प्यार के बारे में उनके विचार इतने सशक्त और सुलझे हुए थे कि मैंने सोचा—पहले मैं खुद को उस काबिल बना लूँ।

बस, इसी कशमकश में मैं तुम्हें नज़रअंदाज़ करता रहा, अपनी नज़रों में बसाने के बावजूद।

तुम्हारी नज़रों को तो मैं पहले ही पढ़ चुका था, जिनमें सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही था। पर मैं पापा को थोड़ा और समय देना चाहता था, ताकि वे मुझे समझ सकें।

तुम्हें शायद पता नहीं, कल ही उन्होंने मुझसे कहा—

"बस... अब रिया के हाथ पीले कर दूँ, तो गंगा नहा लूँ।"

मैंने उनसे उनकी पसंद पूछी। उन्होंने कुछ पल शांत होकर मेरी ओर देखा, फिर मुस्कराकर कहा—

"बस... तुम्हारे जैसा ही चाहिए।"

मैं सब समझ गया।

अब तुम भी समझ जाओ।

बस... तैयार रहना।

तुम्हारा साथ चाहिए।

तुझसे मेरा फ़ासला है एक ख़याल भर का,

तू मुझे सोच तो सही—देख, तेरे पास ही हूँ मैं।

जो हमेशा से ही तुम्हारा था...

—प्रमोद

रचनाकार

प्रस्तुति व पाठ्य विस्तार और सहयोग 










 

Comments

Popular posts from this blog

निर्णय का निर्वाण (लघुकथा)

बाला और कचनार - सुनिता मीणा

एक घटना, दो पहलू