"काहे को ब्याही विदेश..."

"काहे को ब्याही विदेश..."

भूमिका

"काहे को ब्याही विदेश..." केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हर उस बेटी के मन की अनकही पीड़ा है, जिसके लिए पिता संसार का सबसे सुरक्षित आश्रय होते हैं। यह कथा बचपन की मधुर स्मृतियों, पिता-पुत्री के अनुपम स्नेह, समय की निर्ममता और दूरियों की विवशता को इतनी सहजता से उकेरती है कि पाठक स्वयं को इसके पात्रों के बीच खड़ा महसूस करने लगता है। कहानी का प्रत्येक प्रसंग अंततः एक ऐसे प्रश्न पर आकर ठहरता है, जिसका उत्तर आज भी असंख्य बेटियाँ अपने आँसुओं में खोजती हैं—"ओ बाबुल मेरे... काहे को ब्याही विदेश..."

कहानी

"काहे को ब्याही विदेश..."

"काहे को ब्याही विदेश..."

गीत सुनते-सुनते मिनी फूट-फूटकर रो पड़ी।

"क्यों... पापा, क्यों...?"

उसे आजकल पापा की बहुत याद आ रही थी। आज पूरे तीन दिन हो चुके थे। उसकी पापा से बात नहीं हो पाई थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।

रोते-रोते वह यादों की उस अमराई में पहुँच गई, जहाँ पापा मुस्कुराते हुए कहते थे, "बोल मेरी गुड़िया! क्या चाहिए तुझे? तू बोल तो सही।" और वह झट से अपनी फरमाइश उनके सामने रख देती।

यादों की वही डोर उसे उन उँगलियों तक ले गई, जिन्हें थामकर उसने चलना सीखा था। यादों के साथ-साथ मिनी भी आगे बढ़ती चली गई।

गर्मी के दिन थे। दोपहर में अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। वह दूर खड़ी होकर बारिश की बौछारों को निहार रही थी। आम के पेड़ों से कैरियाँ टप-टप गिर रही थीं। बारिश थमते ही वह दौड़ पड़ी। कीचड़ की परवाह किए बिना एक-एक कैरी उठाकर अपनी फ्रॉक में भरने लगी।

तभी मम्मी की आवाज आई, "अरे मिनी! यह बड़ी बाल्टी ले जा। इसमें सारी कैरियाँ भर ले।"

पर मैं तो अपनी ही धुन में बोलती जा रही थी, "मम्मी! आज पापा को इतनी सारी कैरियाँ दिखाकर उन्हें आश्चर्यचकित कर दूँगी।"

शाम को जब पापा आए और उन्होंने कैरियाँ देखीं, तो वे उतने खुश नहीं हुए, जितनी मुझे उम्मीद थी। मैंने आश्चर्य से पूछा, "क्या हुआ, पापा?"

उन्होंने एक छोटी-सी कैरी उठाकर मुस्कुराते हुए कहा, "मिनी, यह अभी बिल्कुल तुम्हारी तरह छोटी है। कुछ दिन और पेड़ पर रहती, तो और बड़ी हो जाती।"

मेरे मासूम मन को जैसे हल्की-सी चोट लगी। तभी मेरी नजर उन कैरियों पर गई, जो गिरने से टूट-फूट गई थीं। मैंने उन्हें उठाते हुए कहा, "हाँ पापा, इन्हें देखिए... इन्हें तो चोट भी लग गई है। क्या मैं इन पर दवा लगा दूँ?"

मेरी बात सुनकर पापा ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए, मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और बोले, "मेरी प्यारी गुड़िया..."

समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया। जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी, पापा से मेरी दोस्ती भी गहरी होती चली गई। मैं उनकी मुस्कान थी और वे मेरा अभिमान। मेरी हर शरारत में वे बराबर के साथी बन जाते।

मम्मी अक्सर कहतीं, "बेटी को एक दिन पराए घर भी जाना है।"

यह सुनते ही पापा की आँखें भीग जातीं। फिर तुरंत मुस्कुराकर कहते, "व्हाट डू यू मीन... पराया घर?"

और फिर हम दोनों बिना किसी वजह के खिलखिलाकर हँस पड़ते। जीवन के हर छोटे-बड़े पल को पूरे मन से जीना मैंने पापा से ही सीखा था।

उनका सबसे प्रिय गीत था—

*"मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया..."*

मेरे पापा मेरे हीरो थे—मेरी प्रेरणा, मेरे दोस्त, मेरे शिक्षक... मेरे लिए वही सब कुछ थे।

वे सचमुच किसी हीरो की तरह गोरे-चिट्टे थे। मैं भी बिल्कुल उन पर ही गई थी—दूध-सी उजली। हम दोनों अक्सर आईने के सामने खड़े होकर एक-दूसरे को देखते और बहस करते।

पापा पूछते, "बताओ, हम दोनों में ज्यादा गोरा कौन है?"

मैं तुरंत कहती, "मैं!"

वे हँसकर कहते, "गोरा तो मैं हूँ। तुम तो चाँदनी की तरह सफेद हो।"

और मैं खिलखिलाकर हँस पड़ती।

लेकिन हँसी के वे दिन जैसे पंख लगाकर उड़ गए। धीरे-धीरे वह समय भी आ गया, जब मुझे सचमुच पराए घर जाना था।

ऋषभ, पापा के मित्र का बेटा था। वह कुछ दिनों के लिए अमेरिका से भारत आया हुआ था। पापा की नज़र में वह मेरे लिए सबसे उपयुक्त जीवनसाथी था।

एक दिन उन्होंने बड़े विश्वास से कहा, "ऋषभ के साथ तुम बहुत खुश रहोगी। तुम्हें मेरी कमी भी महसूस नहीं होगी। तुम्हारे लिए मैं किसी और पर इतना भरोसा नहीं कर सकता।"

ऋषभ सचमुच बहुत समझदार और स्नेही था। उससे जब-जब बात होती, मुझे उसके व्यवहार में पापा की झलक दिखाई देती। शायद हर लड़की अपने होने वाले जीवनसाथी में कहीं-न-कहीं अपने पिता का ही अक्स तलाशती है। यह बात मुझे उसी समय समझ में आई।

फिर सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मानो 'चट मंगनी, पट ब्याह' वाली कहावत मेरे ही लिए बनी हो।

विदाई का वह क्षण आज भी मेरी स्मृतियों में ज्यों-का-त्यों अंकित है। मैं पापा के गले लगकर फूट-फूटकर रो रही थी। उन्होंने अपने आँसू छिपाते हुए हँसकर कहा, "आज जी भरकर रो लो... फिर तो ऋषभ को ही तुम्हारे नखरे झेलने हैं।"

इतना कहकर उन्होंने अपनी छलछलाई आँखें दूसरी ओर फेर लीं।

मैं, जो पापा के बिना एक दिन भी नहीं रह सकती थी, उनसे हजारों मील दूर चली आई। मन में एक ही टीस बार-बार उठती रहती—

**"काहे को ब्याही विदेश..."**

विदेश आने के बाद भी पापा मेरे जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा बने रहे। उनके साथ बिताए हर छोटे-बड़े पल की बातें मैं ऋषभ से साझा करती।

एक दिन मैंने उससे कहा, "मैं तो भारत छोड़कर आना ही नहीं चाहती थी। लेकिन पापा ने ही समझाया था—'अरे, अमेरिका है ही कितना दूर, मेरी गुड़िया! जब चाहे पंख लगाकर चली आना।' और देखो... मैं सचमुच पंख लगाकर तुम्हारे साथ अमेरिका चली आई।"

मेरी बात सुनकर ऋषभ ने मुझे ठीक वैसे ही अपने गले से लगा लिया, जैसे पापा बात-बात पर मुझे सीने से लगा लिया करते थे।

पापा-मम्मी से मेरी रोज़ वीडियो कॉल पर बातें होती थीं। लगता ही नहीं था कि हम सात समुंदर दूर हैं।

इसी बीच कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया। देखते-ही-देखते सब कुछ बदल गया। जो जहाँ था, वहीं का होकर रह गया। यात्रा पर जैसे समय ने ताला लगा दिया।

एक वर्ष बीत गया।

कुछ दिनों से मैंने महसूस किया कि पापा पहले जैसे चंचल नहीं रहे थे। बात करते समय वे कुछ थके-थके और सुस्त दिखाई देते।

मैंने पूछा, "क्या बात है, पापा? तबीयत तो ठीक है न?"

वे हमेशा की तरह मुस्कुराकर कहते, "कुछ नहीं, गुड़िया... बस तुम्हारी बहुत याद आती है। अमराई, आँगन, आईना... सब तुम्हें याद करते हैं। अपना ख्याल रखना। माहौल ठीक होते ही उड़कर चली आना।"

उनकी बातें सुनकर मैं सोचने लगती—पंख तो हैं, खुला आसमान भी है, फिर भी उड़ न पाने की यह कैसी मजबूरी है? काश! मैं सचमुच एक पंछी होती। तब किसी भी सीमा, किसी भी प्रतिबंध को पार कर पापा के पास पहुँच जाती।

आज पहली बार लगातार तीन दिन हो गए थे। पापा से मेरी बात नहीं हुई थी। मन अनजानी आशंका से घिरने लगा था। मैं उन्हें बहुत-सी बातें बताना चाहती थी—इन तीन दिनों की हर छोटी-बड़ी बात। एक बार फिर आईने में उनके साथ खुद को निहारना चाहती थी। बारिश में भीगती कैरियाँ बटोरकर उन्हें फिर से आश्चर्यचकित करना चाहती थी।

यही सोचकर मैंने यादों का सफर वहीं रोका और पापा को फोन मिलाया। कोई उत्तर नहीं मिला। फिर मम्मी को फोन किया। वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आया।

अब मन बुरी तरह घबराने लगा। जो अपनों से बहुत दूर होते हैं, वे केवल आशंकाएँ ही लगा सकते हैं; दौड़कर उनके पास नहीं पहुँच सकते।

ऋषभ बार-बार मुझे ढाढ़स बँधाने की कोशिश कर रहा था। तभी अचानक पापा के मोबाइल से कॉल आया।

मैंने झट से फोन उठाया और बिना कुछ सुने बोल पड़ी, "यह क्या तरीका है, पापा? तीन दिन हो गए और अभी भी नॉर्मल कॉल! जल्दी रखिए... वीडियो कॉल पर बात करते हैं। मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं।"

अपनी ही बातों में मैं उधर की आवाज़ सुन ही नहीं पाई।

फिर बहुत दूर से आती, सिसकियों में डूबी एक आवाज़ सुनाई दी—

"मिनी... पापा... नहीं रहे..."

एक पल में जैसे समय ठहर गया।

मेरे हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। मैं न रो पा रही थी, न बोल पा रही थी।

ऋषभ ने मुझे संभालने की बहुत कोशिश की, लेकिन मेरे होंठों से केवल एक ही वाक्य बार-बार निकल रहा था—

"हम लड़कियों की शादी कभी इतनी दूर नहीं करनी चाहिए कि ज़रूरत पड़ने पर हम अपने अपनों तक भी न पहुँच सकें। अगर मैं वहाँ होती... तो कम-से-कम पापा से एक बार मिल तो पाती..."

आज भी कितनी ही अनकही बातें मेरे भीतर शोर मचाती हैं।

कोरोना का दौर समाप्त होने के बाद जब मैं उस घर, उस आँगन में पहुँची, तो सब कुछ वैसा ही था। पापा का बिछौना, उनका पानी का जग, उनका चश्मा... सब कुछ अपनी जगह पर अनछुआ रखा था।

बदला था तो केवल इतना कि घर में अब उनकी आवाज़ नहीं थी।

मन बार-बार उन वस्तुओं को छूता और ऐसा लगता मानो उनमें आज भी पापा की उष्मा बाकी हो। किंतु सच यही था कि अब वे केवल एक तस्वीर में कैद थे और हम उनकी स्मृतियों में।

तभी बचपन में सुना वह गीत अनायास याद आ गया—

*"सात समुंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से,

चाहे गुड़िया मत लाना,

पापा जल्दी आ जाना..."*

पर अब तो पापा उस लोक में जा चुके थे, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। और उनकी गुड़िया भी सात समुंदर पार से उनसे मिलने नहीं पहुँच सकी।

मेरे अधरों पर फिर वही करुण स्वर तैर उठा—

"काहे को ब्याही विदेश...

ओ बाबुल मेरे...

काहे को ब्याही विदेश..."

रचनाकार



पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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