चंदू के जीजू
चंदू के जीजू
रिश्तों में थोड़ी शरारत हो तो अपनापन और भी गहरा हो जाता है...
भूमिका
कभी-कभी जीवन की सबसे खूबसूरत शामें किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए कुछ साधारण-से पलों से बनती हैं। और जब ऐसे पलों में कोई शरारती साला शामिल हो जाए, तो जीजा की शाम कब हँसी-मज़ाक, उलझन और परेशानी में बदल जाए—कहना मुश्किल है।
जीतू भी उस दिन परिवार के साथ कुछ सुखद पल बिताने निकला था। उसे क्या पता था कि एक फ़ेसबुक पोस्ट उसकी शाम का नक्शा बदल देगी और रात को आने वाला सपना अगली सुबह एक मज़ेदार हकीकत का संकेत बन जाएगा!
तो आइए, पढ़ते हैं जीजा-साले के रिश्ते की नोकझोंक, अपनापन और हास्य से भरी कहानी—‘चंदू के जीजू’।
कहानी
शाम के छह बज रहे थे। जीतू के दफ़्तर से घर लौटने का समय हो गया था। घर पर उसकी पत्नी सोनाली और बेटा पिंकू पहले से ही नए कपड़े पहनकर तैयार बैठे थे।
आज कई दिनों बाद पूरा परिवार साथ में कहीं घूमने जाने वाला था।
जीतू ने घर की घंटी बजाई। सोनाली ने दरवाज़ा खोला।
सोनाली को देखते ही जीतू के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“क्या बात है, भाग्यवान! आज तो बड़ी सुंदर लग रही हो।”
सोनाली कुछ कहती, उससे पहले पिंकू सामने आ गया।
“पापा, मैं कैसा लग रहा हूँ?”
जीतू ने बेटे को प्यार से देखा।
“अरे! तू तो मेरा हीरो है। लेकिन यह बताओ, तुम दोनों इतनी सज-धजकर कहाँ जाने की तैयारी में हो?”
सोनाली मुस्कुराई।
“अजी, बहुत दिन हो गए हम सब एक साथ कहीं घूमने नहीं गए। इसलिए आज आप भी जल्दी से कपड़े बदल लीजिए और हमें कहीं घुमाने ले चलिए।”
पिंकू ने भी माँ की हाँ में हाँ मिलाई।
“हाँ पापा, चलो न आज बाहर चलते हैं। मेरा स्कूल का सारा होमवर्क भी खत्म हो गया है।”
जीतू ने हथियार डालते हुए कहा—
“अच्छा भाई, ठीक है! पहले मुझे कपड़े तो बदल लेने दो। पिंकू, एक गिलास पानी तो पिला दे।”
कुछ ही देर में तीनों तैयार होकर गाड़ी में बैठ गए।
पिंकू ने मोबाइल पर अपने पसंदीदा नए गाने चला दिए। गाड़ी शहर के एक बड़े पार्क की ओर चल पड़ी।
पार्क पहुँचते ही तीनों का मन प्रसन्न हो गया। चारों ओर हरियाली थी। रंग-बिरंगे फूल अपनी सुंदरता बिखेर रहे थे। बच्चे खेल रहे थे और लोग परिवार के साथ शाम का आनंद ले रहे थे।
पिंकू ने उत्साह में अपने मम्मी-पापा के साथ एक तस्वीर खींची और तुरंत फ़ेसबुक पर अपलोड कर दी।
कैप्शन था—
“Enjoying with Mummy-Papa.”
कुछ देर घूमने के बाद तीनों ने आइसक्रीम, भेलपुरी और दही भल्लों का आनंद लिया।
अभी वे दही भल्लों का स्वाद ले ही रहे थे कि जीतू का मोबाइल बज उठा।
कॉल चंदू का था।
जीतू ने फोन उठाया।
उधर से आवाज़ आई—
“अरे वाह, जीजा जी! अकेले-अकेले घूम रहे हो!”
जीतू चौंक गया।
“तुम्हें कैसे पता कि हम घूमने आए हैं?”
चंदू ठहाका लगाकर बोला—
“जीजा जी, मुझसे क्यों छिपा रहे हो? इतनी अच्छी फोटो फ़ेसबुक पर लगी है और आप कहते हो कि मुझे पता कैसे चला!”
जीतू कुछ पल चुप रहा।
“कौन-सी फोटो? कैसी फोटो?”
फिर उसे कुछ समझ आया। उसने तुरंत पिंकू की ओर देखा।
“पिंकू! तूने फ़ेसबुक पर कोई फोटो लगाई है क्या?”
पिंकू ने बिल्कुल सहजता से जवाब दिया—
“जी पापा, मैंने लगाई है। क्यों, क्या हुआ?”
जीतू ने माथे पर हाथ रख लिया।
“अरे तेरे मामू पूछ रहे हैं कि हम कहाँ घूम रहे हैं!”
पिंकू ने तुरंत कहा—
“वाह! मामाजी! मेरी बात करवाओ।”
सोनाली भी भाई की आवाज़ सुनकर खुश हो गई। कुछ देर तक पिंकू और सोनाली चंदू से बातें करते रहे।
सबसे बात हो जाने के बाद चंदू ने फिर अपने जीजू की टांग खींचनी शुरू कर दी।
“जीजू, मैं सोच रहा हूँ कि इस बार छुट्टियों में आपके पास आ जाऊँ। फिर मुझे भी ऐसे ही दही भल्ले खिलाना।”
जीतू ने हँसते हुए कहा—
“अरे भई चंदू! तू कहे तो अभी तुझे दही भल्ले पार्सल कर देता हूँ।”
चंदू ने तुरंत जवाब दिया—
“अरे नहीं जीजा जी! इतना प्यार मुझसे हज़म नहीं होगा। हम दोनों इकट्ठे खाएँगे न!”
जीतू भी कहाँ पीछे हटने वाला था।
“अरे नहीं चंदू! तू सारे दही भल्ले अकेला खा लेना। मैं तुझे सारा दिन दही भल्ले खिलाऊँगा।”
चंदू ने भावुक होने का अभिनय करते हुए कहा—
“जीजा जी, मैं अकेले-अकेले खाऊँ और आप मुझे देखते रहें—यह तो अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए हम दोनों मिलकर सारे दही भल्ले खाएँगे। इतिहास में हमारा नाम होगा कि जीजा-साले की जोड़ी हो तो ऐसी हो!”
“बाय जीजू!”
कहकर चंदू ने फोन काट दिया।
पास ही खड़ा दही भल्ले वाला उनकी पूरी बातचीत सुन रहा था। वह मुस्कुराते हुए जीतू के पास आया और बोला—
“भाई साहब, आपके साले साहब कब पधार रहे हैं दही भल्ले खाने?”
जीतू झुंझला गया।
“ओ भाई! तू अपना काम कर!”
दही भल्ले वाला मुस्कुराता हुआ वापस चला गया, लेकिन जीतू का मूड पूरी तरह बदल चुका था।
“चलो, अब यहाँ से चलते हैं।”
सोनाली और पिंकू उसके पीछे-पीछे चल पड़े।
पिंकू ने हैरानी से पूछा—
“क्या हुआ पापा? अभी तो हमने पार्क ठीक से देखा भी नहीं!”
जीतू ने गुस्से में बेटे से पूछा—
“तुझे किसने कहा था फ़ेसबुक पर फोटो लगाने के लिए? मुझे यहाँ और नहीं रुकना!”
सोनाली ने भी हैरानी से पूछा—
“अभी तो आए हैं। अब कहाँ चलेंगे?”
जीतू ने कुछ सोचकर कहा—
“चलो, फिल्म देखने चलते हैं।”
पिंकू का चेहरा तुरंत खिल उठा।
“ठीक है पापा! वैसे भी दो दिन पहले एक नई फिल्म आई है। मेरे सारे दोस्त देख भी चुके हैं। बहुत कॉमेडी फिल्म है। जब तक हम सिनेमा पहुँचेंगे, मैं आपके फोन से टिकट बुक कर दूँगा।”
“चलो ठीक है,” सोनाली ने कहा।
तीनों सिनेमा हॉल पहुँच गए।
फिल्म शुरू होने से पहले स्क्रीन पर फिल्म का नाम आया।
जीतू की आँखें फटी की फटी रह गईं।
फिल्म का नाम था—
‘जीजा जी’
जीतू ने माथा पकड़ लिया।
“हे भगवान! आज तो ‘जीजा जी’ शब्द मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहा!”
सोनाली और पिंकू पॉपकॉर्न लेकर फिल्म देखने में व्यस्त हो गए।
इधर जीतू वॉशरूम जाने के लिए बाहर निकला। रास्ते में वह मन ही मन सोच रहा था—
“मैं आज घर से बाहर घूमने निकला ही क्यों?”
तभी अचानक उसके कानों में तेज़ आवाज़ पड़ी—
“अजी सुनो! अब उठ भी जाओ। आज रविवार है तो क्या सारा दिन सोते ही रहोगे?”
जीतू ने घबराकर आँखें खोल दीं।
वह अपने बिस्तर पर था!
कुछ पल तक वह चुपचाप छत को देखता रहा। फिर उसके चेहरे पर राहत की मुस्कान आई।
पार्क, फ़ेसबुक, दही भल्ले, चंदू और फिल्म—सब एक सपना था!
उसने राहत की साँस ली।
“चलो अच्छा है! सपना ही था। अब आराम से बाथरूम में नहा आता हूँ।”
लेकिन...
कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। असली मज़ा तो अभी बाकी था!
जीतू ने जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से आवाज़ आई—
“जीजा जी, रुकिए! मैं नहा लूँ, फिर आप जाइएगा।”
जीतू के चेहरे का रंग उड़ गया।
“चंदू...?”
इतने में सोनाली हँसते हुए बोली—
“हाँ, चंदू! आपको पता नहीं? वह आज सुबह पाँच बजे ही यहाँ आ गया था। अब पूरे एक हफ़्ते यहीं रहेगा।”
जीतू ने अपना माथा पकड़ लिया।
बस फिर क्या था—बज गया जीतू का बाजा!
इतने में बाथरूम का दरवाज़ा खुला और चंदू मुस्कुराता हुआ बाहर आया।
उसने जीतू के कंधे पर हाथ रखा और बोला—
“क्यों जीजू... कैसी रही मेरी स्कीम?”
जीतू कुछ पल तक उसे देखता रहा।
चंदू खिलखिलाकर हँस पड़ा।
सोनाली भी अपनी हँसी नहीं रोक पाई और पिंकू तो पहले ही मज़ा ले रहा था।
जीतू ने लंबी साँस ली और मन ही मन कहा—
“एक हफ़्ता...? हे भगवान! अब तो रोज़ दही भल्ले खिलाने पड़ेंगे!”
घर में हँसी गूँज उठी।
और चंदू की शरारत ने एक साधारण रविवार को जीजा-साले के रिश्ते की एक यादगार कहानी में बदल दिया।
सीख
रिश्ते केवल जिम्मेदारियों से नहीं चलते। उनमें हँसी, अपनापन, छेड़छाड़ और साथ बिताए छोटे-छोटे पल भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
आज सोशल मीडिया ने हमारी खुशियों को अपनों तक पहुँचाना आसान कर दिया है, लेकिन उसके साथ हमारी निजी जिंदगी का दायरा भी सार्वजनिक हो गया है। पिंकू की एक छोटी-सी फ़ेसबुक पोस्ट ने जहाँ चंदू को दूर बैठे-बैठे परिवार की खबर दे दी, वहीं उसी पोस्ट ने जीतू की शाम को हास्य का विषय बना दिया।
कहानी यह भी बताती है कि परिवार में ऐसी शरारतें तभी सुंदर लगती हैं, जब उनके पीछे प्रेम हो। रिश्तों में हँसी बची रहे तो जीवन की बहुत-सी परेशानियाँ भी हल्की लगने लगती हैं।
इसलिए अपनों के साथ समय बिताइए, खूब हँसिए और रिश्तों में औपचारिकता से अधिक अपनापन रखिए।
क्योंकि जिंदगी बहुत लंबी नहीं होती, लेकिन अच्छी यादें उसे बहुत खूबसूरत बना देती हैं।
रचनाकार
जया सूद (कवयित्री/कहानीकार)


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