छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ

छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ

भूमिका 

कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी विद्यालय की कक्षा में नहीं, बल्कि यात्रा के दौरान सहज संवादों में मिल जाती है। मासूम बच्चों के मन में उठने वाले छोटे-छोटे प्रश्न ही उन्हें प्रकृति, जीवन और ईश्वर के गहरे रहस्यों तक पहुँचा देते हैं। प्रस्तुत कहानी भी एक ऐसे ही नन्हे बालक की है, जिसने ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकते हुए केवल पेड़, पहाड़ और बादलों को नहीं देखा, बल्कि प्रकृति के अद्भुत नियमों और संघर्ष में भी जीवन का अमूल्य संदेश खोज लिया। आइए, पढ़ते हैं यह प्रेरक बाल-कथा।

छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ

आज बंटी बहुत खुश था, क्योंकि वह पहली बार ट्रेन में बैठा था। छुक-छुक करती ट्रेन और भागते-दौड़ते पेड़ उसे बहुत लुभा रहे थे। खंभे, बिजली के तार और दूर-दूर तक फैले खेत उसे ऐसे दिखाई दे रहे थे, मानो वे सब उसके साथ दौड़ रहे हों।

वह उत्साह से दादी से बोला,

"देखो दादी, ये खंभे हमसे भी तेज भाग रहे हैं, ना?"

दादी मुस्कुराईं और बोलीं,

"और वह पेड़ भी?"

बंटी ने हँसते हुए कहा,

"हाँ दादी, वह पहाड़ भी... नदी भी... सब हमारे साथ-साथ चल रहे हैं।"

इतने में ट्रेन एक सुरंग में प्रवेश कर गई। चारों ओर अचानक अँधेरा छा गया। नन्हा बंटी घबरा गया और तुरंत दादी से लिपट गया।

कुछ ही क्षणों बाद ट्रेन सुरंग से बाहर निकली। फिर वही सुनहरी धूप, खुला आसमान और मनमोहक दृश्य।

बंटी खिड़की से बाहर देखकर खुशी से बोला,

"देखो दादी, बादल कितने सुंदर लग रहे हैं!"

थोड़ी देर बाद उसके मन में एक नया प्रश्न आया। उसने पूछा,

"दादी, यहाँ तो कोई भी नहीं रहता। फिर ये पेड़ इतने बड़े कैसे हो गए? हमारे घर पर तो हम बीज बोते हैं, खाद डालते हैं और रोज़ पानी भी देते हैं।"

बंटी का यह प्रश्न सुनकर दादी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने स्नेह से पूछा,

"बताओ बेटा, भगवान ने हमें कौन-कौन सी चीज़ें बिना किसी कीमत के दी हैं?"

बंटी कुछ पल सोचता रहा। फिर बोला,

"बारिश... धूप... और... हवा!"

दादी ने मुस्कुराकर कहा,

"बिलकुल सही। पेड़ों को भी तो यही सब चाहिए।"

बंटी तुरंत बोला,

"और मिट्टी भी चाहिए, ना दादी?"

दादी ने सिर हिलाते हुए कहा,

"हाँ बेटा। जंगलों में चारों ओर उपजाऊ मिट्टी होती है। जब हवा चलती है, तो वह अपने साथ अनेक फूलों और फलों के बीज दूर-दूर तक ले जाती है। बारिश उन बीजों को सींचती रहती है। खुला आसमान उन्हें भरपूर धूप देता है और मौसम के अनुसार वे अपने आप बढ़ते चले जाते हैं।"

बंटी ने उत्साहित होकर कहा,

"हाँ दादी, अब मैं समझ गया। हमारे घर में धूप कम आती है, इसलिए कभी-कभी पौधे सूख जाते हैं।"

दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

"हाँ बेटा। प्रकृति इन पेड़ों को समय पर हवा, पानी और धूप देती है, इसलिए ये मजबूत बनते हैं। यदि कभी इन्हें काट भी दिया जाए, तो इनकी गहरी जड़ें इन्हें फिर से जीवन दे देती हैं। ये पेड़ हमें सिखाते हैं कि जीवन में कभी भी घबराना नहीं चाहिए। विपरीत परिस्थितियों का भी साहस और धैर्य से सामना करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर हर पल हमारी रक्षा और मार्गदर्शन कर रहा होता है।"

इतना कहकर दादी ने प्यार से बंटी का माथा चूम लिया।

ट्रेन का यह छोटा-सा सफ़र बंटी के लिए केवल एक यात्रा नहीं रहा, बल्कि प्रकृति के महत्व, आत्मविश्वास, संघर्ष और जीवन के अमूल्य सत्य को समझने का सुंदर माध्यम बन गया।

रचनाकार

आरना बजाज

मुंबई

समग्र भाव चित्रों में




प्रस्तुति






सहयोग








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