एक कप चाय - प्रमिला त्रिवेदी

एक कप चाय

भूमिका

क्या कभी ऐसा हुआ है कि एक ही घर में रहते हुए भी दो पीढ़ियाँ एक-दूसरे से कोसों दूर महसूस करें? क्या एक छोटी-सी बातचीत उस दूरी को पाट सकती है? और अगर बातचीत की शुरुआत एक कप चाय के साथ हो, तो क्या रिश्तों में जमी खामोशी भी पिघल सकती है? आइए, जानते हैं दादाजी और उनके पोते अंश की यह छोटी-सी, मगर रिश्तों की बड़ी सच्चाई कहती कहानी।

एक कप चाय

दादाजी बरामदे में बैठे थे। सामने उनका पोता अंश मोबाइल में खोया हुआ था। कई दिनों से दोनों के बीच बातचीत लगभग बंद थी। दादाजी को लगता था कि आज की पीढ़ी के पास बड़ों के लिए समय नहीं है, और अंश को लगता था कि दादाजी उसकी दुनिया समझना ही नहीं चाहते।

एक शाम बिजली चली गई। मोबाइल की बैटरी भी समाप्त हो गई। अंश अनमने मन से बरामदे में आकर बैठ गया।

दादाजी मुस्कुराए और बोले, “चलो, आज तुम्हें अपने बचपन की एक कहानी सुनाता हूँ।”

अंश ने पहली बार ध्यान से सुना। कहानी पूरी हुई तो उसने कहा, “दादाजी, आपके ज़माने में सचमुच बहुत संघर्ष था।”

दादाजी ने भी मुस्कुराकर पूछा, “और तुम मुझे यह बताओ कि यह मोबाइल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैसे काम करती है?”

उस रात एक कप चाय के साथ दो पीढ़ियाँ आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ बैठी थीं।

अगले दिन से अंश रोज़ कुछ समय दादाजी के साथ बिताने लगा। दादाजी उससे नई तकनीक सीखते और अंश उनसे जीवन के अनुभव।

घर में कुछ भी नहीं बदला था—न दीवारें, न फर्नीचर। बदला था तो केवल संवाद का तरीका।

उसी दिन सबने समझ लिया कि जनरेशन गैप उम्र का नहीं, संवाद का अंतर होता है। जहाँ बातचीत जीवित रहती है, वहाँ रिश्ते कभी बूढ़े नहीं होते।

सृजक

प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन
महिला प्रकोष्ठ
बेंगलुरु
प्रस्तुति





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